* निर्वाण *
हमें ईश्वर ने जन्म दिया, इस संसार में भेजा, हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उसके बताए हुए रास्ते पर चलें और अपने धर्म का पालन करें ! लेकिन हम माया, मोह में पड़कर अपना हर कर्तव्य, धर्म भूल जाते हैं ! और ग़लत तरीके से धन, दौलत इकट्ठा करने की हर मुमकिन कोशिश करते रहते हैं क्योंकि हम अपने परिवार वालों को सारी सुख - सुविधा देना चाहते हैं अपने बच्चों के लिए वह सब कुछ करना चाहते हैं जिसके सपने हमने कभी अपने लिए देखे थे और इन्हीं सब की कोशिश करते - करते अपना सारा जीवन उनकी (बच्चों की खुशी) के लिए न्योछावर कर देते हैं, पर जब हमें हमारे बच्चों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है ( वृद्धा अवस्था में ) तब हम हमारे बच्चों के लिए बोझ बन जाते हैं हमारे बच्चे इतना कहने में भी थोड़ा सा संकोच नहीं करते कि "आपने हमारे लिए किया ही क्या है" बिना यह सोचे कि हमने अपना सारा जीवन इनकी पढ़ाई-लिखाई और भविष्य बनाने के लिए लगा दिया ! तब हमें ईश्वर की याद आती है, ईश्वर ही हमारा एकमात्र सहारा होता है जिससे हमें उम्मीद होती है अगर हम तब भी इस संसार रूपी माया मोह को त्याग कर अपना बचा हुआ जीवन उस ...