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Showing posts with the label Inspirational story

* निर्वाण *

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 हमें ईश्वर ने जन्म दिया, इस संसार में भेजा, हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उसके बताए हुए रास्ते पर चलें और अपने धर्म का पालन करें ! लेकिन हम माया, मोह में पड़कर अपना हर कर्तव्य, धर्म भूल जाते हैं !  और ग़लत  तरीके से धन,  दौलत इकट्ठा करने की हर मुमकिन कोशिश करते रहते हैं क्योंकि हम अपने परिवार वालों को सारी सुख - सुविधा देना चाहते हैं अपने बच्चों के लिए वह सब कुछ करना चाहते हैं जिसके सपने हमने कभी अपने लिए देखे थे और इन्हीं सब की कोशिश करते - करते अपना सारा जीवन उनकी (बच्चों की खुशी) के लिए न्योछावर कर देते हैं, पर जब हमें हमारे बच्चों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है ( वृद्धा अवस्था में ) तब हम हमारे बच्चों के लिए बोझ बन जाते हैं हमारे बच्चे इतना कहने में भी थोड़ा सा संकोच नहीं करते कि "आपने हमारे लिए किया ही क्या है" बिना यह सोचे कि हमने अपना सारा जीवन इनकी पढ़ाई-लिखाई और भविष्य बनाने के लिए लगा दिया ! तब हमें ईश्वर की याद आती है, ईश्वर ही हमारा एकमात्र सहारा होता है जिससे हमें उम्मीद होती है अगर हम तब भी इस संसार रूपी माया मोह को त्याग कर अपना बचा हुआ जीवन उस ...

*सच्ची सुन्दरता *

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गाँव में एक किसान रहता था ! उसकी दो बेटियाँ थी, बड़ी बेटी बहुत सुन्दर थी,उसके काले, घने,लम्बे, रेशमी बाल  हिरनी की तरह आँखे, होंठ जैसे गुलाब की पंखुड़ी, जिस्म ऐसा कि जैसे किसी ने साँचे में ढाला हो, सोने की तरह दमकती काया, जो एक बार देखता तो बस देखता ही रह जाता,  पर वह बहुत घमंडी थी ! और वहीं छोटी बेटी देखने में साधरण  नयन नक्श और सांवले रंग की थी ! पर उसका स्वभाव निर्मल था, बड़ी बेटी का नाम उसकी सुंदरता को देखते हुए रखा गया था !  "रूपा"  और छोटी बेटी का नाम उसके स्वभाव के अनुसार "निर्मला" रखा गया था ! निर्मला अपने नाम की तरह ही थी, उसका स्वभाव मीठा था उसके मन में अपने से बड़ों के लिए आदर और छोटों के लिए स्नेह था, उसने बहुत सारी  अच्छाइयां थी,  उसे अपने सांवले रंग - रूप का  थोड़ा सा भी दुख नहीं था, सारे गांव वाले उसे बहुत मानते थे  रूपा घमंडी और जिद्दी स्वभाव वाली होने के साथ-साथ बदतमीज भी थी वह अपने आप को दुनिया की सबसे सुंदर लड़की मानती थी और अपने इस स्वभाव के चलते वह लोगों को काफी खरी-खोटी सुनाती रहती थी गांव वाले उससे बात तक ...

*अर्पण *

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 हमारी जिंदगी में कभी कोई इतना खास बन जाता है, कि हम उसके लिए सब कुछ करना चाहते हैं ! उसकी छोटी सी भी तकलीफ हम से बर्दाश्त नहीं होती, हमें बस ऐसा लगता है कि हम ऐसा क्या करें कि उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाए और उसकी छोटी सी मुस्कुराहट के लिए अगर हमें तकलीफों का भी सामना करना पड़े तो हम पीछे नहीं हटते उसकी खुशी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देना चाहते हैं ! मेरी यह कहानी अर्पण ऐसे ही "खास"इंसान पर आधारित है !  मेरा नाम प्रेरणा है, मैं एक मध्यम परिवार मैं पली बढ़ी हूं, घर पर मां - पापा और छोटा भाई है हमारा मकान कानपुर में है मैं एम ए पास करने के बाद B.Ed कर रही थी आगरा में मुझे कॉलेज मिला था जब भी छुट्टियां होती थी मैं आगरा से कानपुर आ जाती थी ! उस दिन भी मैं कानपुर में ही थी जब यह घटना घटी ! हमारे मोहल्ले में एक परिवार रहता था पति पत्नी और उनके दो बच्चे लड़का करीब 8 साल का था उसका नाम केशव था और लड़की करीब पांच साल की रही होगी, उसका नाम लवली था वह अपने नाम की तरह प्यारी थी वह कभी - कभी हमारे घर आ जाया करती थी लवली के पिता बहुत शराब पीते थे अगर उन्हे...

*आस्था *

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  जब बात आस्था और प्रेम की आती है तो मुझे वह दिन याद आता है जब हमारे गांव में वह बुजुर्ग आए थे जिन्हें कोई नहीं जानता था और ना ही उन्होंने किसी को अपना परिचय दिया था ! अपने गांव के प्रति उनकी आस्था 20 सालों बाद उन्हें वहां लेकर आई थी ! गर्मियों के दिन थे 1 दिन सुबह - सुबह मैं दातून कर रहा था तभी मैंने देखा कि एक बुजुर्ग जिनके कपड़े मैले थे और जगह-जगह फटे हुए थे सामने आकर खड़े हो गए ! उन्होंने मेरी ओर देखा और बोले -...पीने के लिए पानी मिलेगा क्या ? मैंने उनकी तरफ ध्यान से देखा मैं उन्हें पहचानने की कोशिश कर रहा था पर इससे पहले मैंने उन्हें कभी नहीं देखा था ! मैंने कुएं से पानी निकाल कर उन्हें पिलाया ! वह बोले भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे.... यह कहकर वह जंगल की तरफ चले गए मैं उन्हें जाते हुए देखता रहा मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि वह यहां ऐसे गांव में क्यों आए हैं जहां के लोगों में एक दूसरे के प्रति गुस्सा जलन और एक दूसरे को जान से मार देने की भावना हो हर व्यक्ति यहां अपने आप में राजा था किसी को किसी की नहीं पड़ी थी आज तक गांव में ना अस्पताल था ना विद्यालय और ना ही पक्की स...

"वजह"

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H हमारे जीवन में कई तरह के उतार -चढ़ाव आते रहते हैं और हम कोशिश करते रहते हैं उनसे बाहर निकलने की, परेशानियों से जूझते रहते हैं ! कभी -कभी मायूसी भी हो जाती है ! फिर कहीं से एक उम्मीद की छोटी सी किरण हमें नज़र आती है और हमारी कोशिशें फिर से ज़ोर पकड़ने लगतीं हैं ! इसके पीछे "वज़ह" होती है जो हमारी उम्मीदों को कभी कम नहीं होने देती ! एक ऐसी ही "वज़ह" से मैं इस कहानी के ज़रिये आप सब को रूबरू कराना चाहती हूँ ! बात उन दिनों की है जब रमेश कक्षा 12 में पढ़ता था ! वह एक ऐसे गाँव का रहने वाला था जहाँ पर विकास के नाम पर कुछ नहीं था ना पक्की सड़क थी, ना लाइट, और ना ही पढ़ने के लिए कोई विद्यालय, रमेश पास के ही गाँव के एक इंटर कॉलेज में पढ़ता था ! रमेश के माता - पिता मजदूरी करते थे, रमेश समझदार था वह जानता था कि माँ - बाबा  किस तरह अपना पेट काटकर उसे पढ़ा रहे है !  इसलिए वह खूब मन लगाकर पढ़ाई  करता था,  वह भी काम करके अपने माँ -बाबा का हाँथ बटाना चाहता था,  पर उस के पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा भी मजदूरी करे ! वह तो बस उसे पढ़ा - लिखा कर अफ़सर बनाना चाहते थे, इस...