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** तमन्ना **

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एक तमन्ना जो दिल में थी तेरे दीदार की बस इक नज़र देख लूँ तो दिल को सुकूं आ जाए इसी कशमकश में गुज़र रहे थे दिन कि तेरी इक झलक ही सही बाखुदा नज़र आ तो जाए बस इसी खयाल में गुम - सुम से तमन्नाए दीदार की ख्वाहिश लेकर एक रोज़ जो गुजरे तेरी गलियों से दिल ने कहा काश !तू नज़र आ जाए कसम खुदा की मेरे एतबार की हद न रही जब तेरा नूरानी चेहरा मुझे नज़र आया एक पल के लिए जैसे सांसें थम सी गई उसे देखने कि चाहत आज पूरी हो गई मुद्द्त से जिसे चाहा था वो मेरी नजरों के सामने ही था ऐ खुदा बस इतना करम हो जाए मुहब्बत नहीं है तो न सही कम से कम एक दोस्त बनकर ही सही ज़िंदगी में तू आ जाए

* इश्क़ है "बेवज़ह" *

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हाँ तुझ से ही करती हूँ इश्क़ मैं "बेवज़ह " न देखा कभी प्यार तेरी आँखों में खुद के लिए फिर भी न जाने क्यूँ तुझ से इश्क़ है  "बेवज़ह " हर पल हर लम्हा इंतज़ार रहता है तेरे आने की उम्मीद तो नहीं है पर न जाने क्यूँ इंतज़ार है "बेवजह " इन आँखों से नींद न जाने क्यूँ रूठी है ख़्वाब का तो पता नहीं पर हर पल तुझे महसूस करती हूँ "बेवज़ह " न तुझ से कोई रिश्ता -नाता है मेरा फिर भी इक अनजानी डोर से बँधी हूँ तुझ से मैं "बेवज़ह " न तुझे पाने की तमन्ना है न खो जाने का डर इक अनजानी मंजिल की तरफ़ चल पड़ी हूँ मैं न जाने क्यूँ "बेवज़ह "

"बेटियाँ "

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किस्मत वालों के नसीब में ही होती हैं बेटियां  कभी बहू कभी बेटी हर शक्ल में खिदमत करती हैं बेटियां हर घर की रौनक होती हैं बेटियों से एक आशियां को जन्नत बनाती हैं बेटियां मगर अफसोस ! आज का दौर क्या है ? अपनों के बीच ही महफूज नहीं है बेटियां एक अच्छी बहू तो चाहिए सबको यहां "महक"  फिर भी घर के आंगन में, क्यों खटकती है बेटियां हर राह चलती लड़की का लोगों को सिर्फ जिस्म दिखता है  जमाने की ऐसी गंदी सोच को कब तक सहती रहेंगी बेटियाँ  हर लड़की किसी की बहन, बेटी है क्यों यह सोच जमाने को नहीं भाती है कुछ घूरती हुई नजरें अनहोनी की दस्तक  हर वक्त डर के साए में रहती हैं बेटियां  आखिर क्यों है यह दहशत जो उन्हें डराती है यह कैसा खौफ है जिसे सोच कर ही वह सहम जाती हैं अब दिल पर रखिए हाथ और सोचिए जरा  "महक"  का है सवाल जवाब दीजिए जरा क्यों सोच ऐसी रखते हैं क्या हम उन्हें जरूरत का सामान दिखते हैं  या अब भी उनकी नजर में खिलौना है बेटियां एक बात अब भी मेरे मन को कचोटती है कि आखिर कब तक, सिसकती रहेंगी बेटियां सिसकती रहेंगी बेटियाँ.....

"औरत "

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जब दुनियाँ में आई तो नाम मिला लड़की का किसी ने दुआयें दीं तो किसी ने लड़की होने पर कोसा किसी ने कहा लक्ष्मी है तो किसी ने नाम दिया पनौती का बचपन बीता जवानी आई तो नाम मिला पराये धन का विदा होकर ससुराल पहुँची तो नया रिश्ता नया नाम मिला किसी की बहू किसी की पत्नी किसी की भाभी होने का सम्मान मिला इन रिश्तों में ऐसी उलझी ज़िंदगी, कि खुद को भूल गई मेरी अपनी पहचान मैं खुद ही भूल गई पर अभी भी सिलसिला नहीं रुका रिश्तों का अभी तो अहसास बाक़ी था माँ बनने का एक नवजात बच्ची से लेकर माँ बनने का अहसास  मैं बयां नहीं कर सकती इतनी बड़ी ज़िंदगी को चंद पन्नों पर नहीं लिख सकती माँ बनने के बाद अहसास हुआ कि औरत क्या होती है हर रिश्ते को एक माला में पिरो कर रखती है....

"आरज़ू "

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आरज़ू थी तेरी कुछ इस क़दर हमें कि तेरी चाहतों के भॅवर में डूबते चले गए ना कुछ समझे ना समझना चाहा बस तेरे वास्ते मिटते चले गए तेरी ख्वाहिशों कि ख़ातिर खुद को भुला दिया फिर भी तेरी नज़र में गुनहगार हो गए इक सवाल अब भी करता है गुफ़्तगू तुम कैसे मेरे जिगर में बसते चले गए फुर्सत अगर मिले तो ये पूँछियेगा खुद से वो कौन सी खता  थी जो गैर हम हुए शिद्दत से चाहने का ईनाम ये मिला हम गैर थे और गैर बनकर ही रह गए अब बा खुदा ना करना "महक "एतबार सब पर ये राह चलते मुसाफ़िर हैं जो अपने नहीं हुए....